साल 2026 में भारत की राजनीति में परिसीमन या Delimitation Bill 2026 एक बड़ा और चर्चित मुद्दा बनकर सामने आया है। संसद के विशेष सत्र में जब इस विषय पर चर्चा शुरू हुई, तो यह केवल चुनावी सीमाओं के पुनर्निर्धारण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रतिनिधित्व, संघवाद (federalism) और महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों से भी जुड़ गया। विशेष रूप से, 2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए परिसीमन को आवश्यक शर्त बनाए जाने से इस बहस ने और भी गंभीर रूप ले लिया है।
भारत में परिसीमन (Delimitation) क्या है?
परिसीमन (Delimitation) का मतलब है चुनावी क्षेत्रों (constituencies) की सीमाओं को तय करना या फिर से निर्धारित करना। आसान शब्दों में, यह तय करता है कि कौन-सा क्षेत्र किस सांसद (MP) को चुनेगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि हर सांसद लगभग बराबर संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे, ताकि चुनाव निष्पक्ष रहें।
परिसीमन क्यों जरूरी है?
परिसीमन का महत्व बराबर प्रतिनिधित्व में है। देश के हर हिस्से में जनसंख्या समान नहीं होती। कहीं ज्यादा लोग रहते हैं, तो कहीं कम। अगर परिसीमन न हो, तो कुछ सांसद बहुत ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करेंगे और कुछ बहुत कम लोगों का। इसलिए परिसीमन “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत को मजबूत करता है।
वर्ष 1971 की जनगणना अभी भी क्यों उपयोग हो रही है?
वर्तमान में लोकसभा की सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर है। इसका कारण यह है कि उस समय भारत में जनसंख्या नियंत्रण पर जोर दिया जा रहा था। दक्षिण भारत के राज्यों ने इसमें अच्छा प्रदर्शन किया, जबकि कुछ अन्य राज्यों में यह उतना सफल नहीं रहा। इसलिए यह तय किया गया कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रित कर रहे हैं, उन्हें कम सीट देकर “सजा” नहीं दी जाएगी।
इसी कारण सीटों को फ्रीज किया गया था, जिसे 42वां संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा लागू किया गया और बाद में 84वां संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया।
परिसीमन विधेयक 2026: क्या प्रस्ताव है?
2026 में लोकसभा के विशेष सत्र में सरकार ने कुछ बड़े बदलाव प्रस्तावित किए हैं। इसमें लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने की बात है। साथ ही, परिसीमन के लिए वर्ष 2011 की जनगणना का उपयोग करने का प्रस्ताव है। इसके बाद महिला आरक्षण को लागू करने की योजना है।
परिसीमन (Delimitation) में मुख्य समस्या क्या है?
परिसीमन 2026 की मुख्य समस्या उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या वृद्धि का अंतर है। उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण भारत ने इसे नियंत्रित किया है। अगर 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन होता है, तो उत्तर भारत को ज्यादा सीटें मिलेंगी और उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ेगी। वहीं दक्षिण भारत की सीटें बढ़ेंगी जरूर, लेकिन उनकी कुल हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
दक्षिणी राज्य परिसीमन का विरोध क्यों कर रहे हैं?
दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, इसलिए उन्हें “सजा” नहीं मिलनी चाहिए। अगर नया परिसीमन लागू होता है, तो उनकी राजनीतिक ताकत कम हो सकती है। यही कारण है कि वे इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं और एक संतुलित समाधान की मांग कर रहे हैं।
परिसीमन और महिला आरक्षण का संबंध
महिला आरक्षण का मुद्दा सीधे परिसीमन से जुड़ा हुआ है। 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून के अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। लेकिन यह भी कहा गया है कि यह आरक्षण तभी लागू होगा जब परिसीमन पूरा हो जाएगा। इसलिए जब तक परिसीमन नहीं होगा, तब तक महिला आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार बनाम विपक्ष का दृष्टिकोण
सरकार का कहना है कि परिसीमन को जल्दी पूरा किया जाना चाहिए और 2011 की जनगणना के आधार पर इसे लागू करना चाहिए, ताकि 2029 तक महिला आरक्षण लागू हो सके। वहीं विपक्ष का मानना है कि परिसीमन जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए। उनका सुझाव है कि पहले महिला आरक्षण लागू किया जाए और फिर सभी राज्यों की सहमति से परिसीमन किया जाए।
परिसीमन विवाद के संभावित समाधान
इस समस्या के कई समाधान सुझाए गए हैं। एक सुझाव है कि 1981 की जनगणना को आधार बनाया जाए, ताकि संतुलन बना रहे। दूसरा सुझाव है कि नई जनगणना (2026–27) के पूरा होने का इंतजार किया जाए। कुछ विशेषज्ञ संयुक्त राज्य अमेरिका के मॉडल से सीखने की बात भी करते हैं, जहां ऊपरी सदन में हर राज्य को समान प्रतिनिधित्व मिलता है, लेकिन भारत में इसे लागू करना आसान नहीं है।
निष्कर्ष: आगे का रास्ता क्या हो?
भारत में परिसीमन का मुद्दा सिर्फ सीमाओं के निर्धारण का नहीं है, बल्कि यह न्याय, प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन से जुड़ा है। भारत को ऐसा समाधान निकालना होगा जो जनसंख्या आधारित लोकतंत्र को भी बनाए रखे और उन राज्यों के साथ भी न्याय करे जिन्होंने बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण दिखाया है। इसके लिए जल्दबाजी के बजाय सभी पक्षों की सहमति से संतुलित निर्णय लेना सबसे बेहतर रास्ता होगा।
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